2002 के गुजरात दंगों में PM मोदी को सुप्रीम कोर्ट से मिली क्लीन चिट

सच की हमेशा जीत होती है और जब बात न्यायालय की चौखट तक पहुंच जाए तो समझिए कि उस सत्य को और अधिक मजबूत आधार मिल जाता है। यही कारण है कि जनता का न्यायपालिका पर अटूट विश्वास कायम है। शुक्रवार को एक बड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पीएम मोदी को क्लीन चिट दे दी जिससे यह साफ हो गया है कि अभी तक उन पर जो आरोप मढ़े जा रहे थे वे सभी बेबुनियाद है। यानि सच से लोग अछूते थे जो सुप्रीम कोर्ट की चौखट से होकर अब जाकर लोगों के बीच पहुंच पाया है। यहां बात हो रही है साल 2002 में हुए गुजरात दंगों की।

पुलिस की कमी के बावजूद गुजरात प्रशासन ने दंगों को शांत करने की पूरी कोशिश की

जी हां, सर्वोच्च न्यायालय ने 2002 के गुजरात दंगों में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और 63 अन्य लोगों की भूमिका को लेकर एसआईटी की ओर से दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि पुलिस की कमी के बावजूद गुजरात प्रशासन ने दंगों को शांत करने की पूरी कोशिश की।

बिना समय गंवाए केंद्रीय सुरक्षा बलों और सेना को सही वक्त पर बुलाया गया

कोर्ट ने कहा कि बिना समय गंवाए केंद्रीय सुरक्षा बलों और सेना को सही वक्त पर बुलाया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शांति बनाए रखने के लिए जनता से कई बार अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट, श्रीकुमार और हरेन पांड्या ने निजी स्वार्थों के लिए झूठे आरोप लगाए। इन्होंने दावा किया कि मोदी के साथ बड़े अधिकारियों की मीटिंग में दंगों की साजिश रची गई और वो इस मीटिंग में मौजूद थे लेकिन हकीकत यह है कि वो उस मीटिंग में मौजूद ही नहीं थे।

निहित स्वार्थों के चलते इस मामले को 16 साल तक जिंदा रखा गया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2006 में जाकिया जाफरी की शिकायत के बाद निहित स्वार्थों के चलते इस मामले को 16 साल तक जिंदा रखा गया। कोर्ट ने कहा कि जो लोग भी कानूनी प्रकिया के गलत इस्तेमाल में शामिल हैं, उनके खिलाफ उचित कार्रवाई होनी चाहिए।

क्या कहती है कोर्ट में जमा की गई एसआईटी रिपोर्ट ?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐसा लगता है कि जाकिया जाफरी किसी और के इशारे पर काम कर रही थीं। उनकी याचिका में कई बातें ऐसी लिखी हैं जो किसी और के हलफनामे दर्ज हैं और वो बातें झूठी पाई गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि एसआईटी ने सभी तथ्यों की ठीक से पड़ताल करके अपनी रिपोर्ट दी है। जांच के दौरान कोई ऐसे सबूत नहीं मिले, जिससे ये संदेह भी होता हो कि राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा की साजिश उच्च स्तर पर रची गई। कोर्ट ने कहा कि हम एसआईटी की रिपोर्ट को स्वीकार करते हैं।

कोर्ट ने 9 दिसंबर, 2021 को फैसला रख लिया था सुरक्षित

कोर्ट ने 9 दिसंबर, 2021 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तीस्ता सीतलवाड़ पर पिछले बीस वर्षों से गुजरात सरकार को बदनाम करने की साजिश करने का आरोप लगाया था। गुजरात सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि जाकिया जाफरी से हमें सहानुभूति है। उन्होंने अपने पति को खोया है लेकिन उनकी पीड़ा का लाभ उठाने की भी एक सीमा होती है। गवाहों को सिखाया-पढ़ाया गया। एसआईटी ने सीतलवाड़ के खिलाफ साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर निर्दोष लोगों को फंसाने का मुकदमा क्यों नहीं चलाया। मेहता ने कहा था कि 2021 में आरोप लगाकर मामले की दोबारा जांच की मांग की जा रही है। मेहता ने आरोप लगाया था कि सिटजन फॉर पीस एंड जस्टिस और सबरंग इंडिया ट्रस्ट का निजी हितों के लिए इस्तेमाल किया गया। इनके खातों का लंबे समय तक ऑडिट नहीं किया गया।

एसआईटी की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने एसआईटी पर लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि एसआईटी ने काफी सूक्ष्मता से जांच की और उसकी जांच में कोई गड़बड़ी नहीं है। रोहतगी ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट ने गुलबर्गा सोसायटी दंगा मामले में 17 जून, 2016 को फैसला सुनाया। जाकिया जाफरी ने 2006 में शिकायत की। जब जाफरी अपना एफआईआर दर्ज करवाने की मांग के लिए हाईकोर्ट गईं तो उनके साथ एक एनजीओ की प्रमुख तीस्ता सीतलवाड़ भी शामिल हो गईं। हाईकोर्ट ने कहा था कि की तीस्ता सीतलवाड़ का इस केस से कोई लेना-देना नहीं है।

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