अज्ञान ही सभी बुराइयों की जड़ है:– धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास

प्रतापगढ़ रामानुज आश्रम महर्षि वेदव्यास जी ४ वेद ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद, अथर्ववेद, महाभारत,पुराण (ब्रह्म पुराण,पद्म पुराण,विष्णु पुराण,वायु पुराण,भागवत पुराण,नारद पुराण,मार्कण्डेय पुराण,अग्नि पुराण,भविष्य पुराण,ब्रह्मवैवर्त पुराण,लिंग पुराण,वराह पुराण,स्कंद पुराण,वामन पुराण,कुरुपुराण (मत्स्य पुराण),गरुड़ पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण,देवी भागवत पुराण), ब्रह्मसूत्र,श्रीमद्भागवत पुराण के रचनाकार हैं।
श्रीमद्देवीभागवत में शास्त्रार्थ की विस्तृत जानकारी और महत्व का जो वर्णन महर्षि ने किया है वो दर्शाता है कि वाद और विवाद को चर्चा के माध्यम से चाहे वो चर्चा किसी भी विषय में हो सनातन संस्कृति में सभी विषयों की चर्चा के लिए सदैव एक व्यवस्था है।

“सहगर्ता व्रतं यत्र स्त्रियं सा पतिव्रता।
सती धर्मेण तां यान्ति पतिलोकं पतिव्रता।।”
(पद्म पुराण, उत्तरखंड, 51.61)

अर्थ: जो स्त्री अपने पति के साथ अग्नि में जलकर मरती है, वह सती कहलाती है और पतिलोक में जाती है।
पद्म पुराण में सती प्रथा का उल्लेख है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह अनिवार्य या आवश्यक है। शास्त्रार्थ से ही संभव हो पाया एक अज्ञान से बनीं कुरीति को चर्चा के माध्यम से सही व्याख्या तक लाया गया ।
परम पूज्य आद्य जगदगुरु शंकराचार्य जी ने अपने काल में व्याप्त कुरीतियों के बारे में कहा था “अज्ञान ही सभी बुराइयों की जड़ है”।
श्लोक में उल्लेख है, बाध्यता तो सनातन के कॉन्सेप्ट में कभी रहा ही नहीं है और समय दर महापुरुष और विदुषी द्वारा इस शास्त्रार्थ:– ( चर्चा,व्याख्या,अनुसंधान,संशोधन से सनातन संस्कृति को और सबल किया है। धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी ने कहा कि “वादे वादे जायते तत्व वोध: “।
हम देखते है सभी ने इस कॉन्सेप्ट को अपनाया है।भले ही सरकार चलाने से लेकर व्यापार चलाने तक लेकिन सबकी सीमा निर्धारित की गई। इसकी व्यवस्था धर्मों में भी है।।।
सनातन संस्कृति में इस चर्चा की व्यवस्था सनातन को और महान बनाता है। सनातन सर्वोपरि है।

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