पं कृपा शंकर ओझा एडवोकेट लोकतंत्र रक्षक सेनानी एक कर्मवीर थे :–धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास

प्रतापगढ़ जनपद में जहां अनेकों संत महात्मा, विद्वानो ने जन्म लिया वहीं पर देश की आजादी एवं दूसरी आजादी के लिए भी अपना जीवन अर्पित करने वाले अनेक महापुरुषों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, लोकतंत्र रक्षक सेनानियों की गाथाओं से यह जनपद अपने को गौरवान्वित करता है। सतयुग से लेकर आज तक यह पावन अवध की धरा गौरवशाली इतिहास को अपने हृदय में समेटे हुए है। इसी कड़ी में एक सामान्य परिवार में वभनमई गांव के करेली खानदान के ओझा पंडित सूर्यनारायण एवं रमराजी देवी के घर पावन संगम नगरी की धरती पर 1 जनवरी 1930 को एक बालक ने जन्म लिया। उस बालक की प्राथमिक शिक्षा कानपुर में हुई।
होनहार विरवान के होत चीकने पात बचपन से ही अन्य बालको से आप अलग थे। तत्पश्चात कक्षा 6 से 7 व 8 की शिक्षा अजित सोमवंशी हाई स्कूल प्रतापगढ़ सिटी से प्राप्त करने के बाद वह बालक कक्षा 9, 10 ,11 ,12 की शिक्षा कान्यकुब्ज इंटर कॉलेज कानपुर से ग्रहण किया। उच्च शिक्षा व एलएलबी की आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त कर एक विद्वान अधिवक्ता के रूप में परिवार को गौरवान्वित किया। हिंदी से स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण किया। देववाणी से भी आपका अगाध प्रेम था क्योंकि आपने संस्कृत में शास्त्री की भी परीक्षा पास किया था। स्वदेश राष्ट्र के प्रेम तथा हिंदी के प्रति आपके मन में जो भाव था उसके परिणाम स्वरूप डॉ राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में राजनैतिक क्षेत्र में पदार्पण किया। जब सोशलिस्ट पार्टी ने 1953 में नहर आंदोलन चलाया तो आपने अग्रणी भूमिका अदा किया जिसमें आपको 6 माह का कारावास भुगतना पड़ा। आपको सोशलिस्ट पार्टी का जिला सचिव बनाया गया था।
एक बार डॉ राम मनोहर लोहिया पट्टी में मीटिंग करने के लिए आए तो आप उनको साइकिल पर बैठाल कर अपने पीछे के करियर पर लेकर पट्टी तक मीटिंग करने के लिए गए थे। जबकि उस समय डॉक्टर लोहिया ने एक निर्णय कोलकाता में लिया था कि जिस वाहन को कोई आदमी खींचेगा हम उस पर नहीं बैठेंगे। आपके अंदर एक उमंग एक जज्बा था 1954 के जुलाई महीने से आपने जनपद प्रतापगढ़ में वकालत प्रारंभ किया था वादकारियों को सुलभ न्याय दिलाने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।
1957 में आपने किसान आंदोलन में सक्रिय भागीदारी किया जिसमें 9 माह की सजा व 28 रुपया जुर्माना प्रतापगढ़ न्यायालय से हुआ। सन 1960 में आपने जिस समय डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने नौजवानों को और पिछड़ों को एकत्रित करके सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाया उसमें आपको दो माह की सजा भुगतान पड़ी अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में आपको दो बार 9,9 माह की सजा भुगतनी पड़ी यह सजा आपको प्रतापगढ़ में कोलकाता से पंजाब मेल जाने वाली ट्रेन के एयर कंडीशन डिब्बे पर लिखी अंग्रेजी में इमारत पर कालिख पोतने के कारण हुई।इस आंदोलन में आपके साथ अवधी के महान कवि जुमई खां आजाद भी जेल गए थे। 1962 व 1967 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से आप बीरापुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े।


सन 1975 में जयप्रकाश आंदोलन चला जो जनपद प्रतापगढ़ में पंडित सूर्यबली पांडे एडवोकेट स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नेतृत्व में जिले में धूम मचा रहा था। उस आंदोलन में आपने सक्रिय भूमिका अदा किया और तत्कालीन जिलाधिकारी सईदुल्लाह की पत्नी बैडमिंटन खेलने आदि हाल जाया करती थी सरकारी गाड़ी से अपनी बेटी के साथ जाती थीं। उस समय रामकुमार की धर्मशाला में एक मीटिंग चल रही थी जिसमें लेखक भी था उसमें अमृतनाथ सिंह अशोक पांडे बलवीर वर्मा जवाहरलाल श्रीवास्तव और अंबिका सिंह लल्ला के साथ घेराव किया कि यह सरकारी गाड़ी जनता के पैसे के पेट्रोल से चलती है, तत्कालीन कप्तान तथा शिवनंदन सिंह कोतवाल आए बहुत समझाया माफी मांगे तब जाकर के गाड़ी छोडी गई। इस प्रकार आपका जीवन एक संघर्ष मय ईमानदार कर्मठ व्यक्ति के रूप में व्यतीत हो रहा था। इसी समय जयप्रकाश आंदोलन में आप लेवी आंदोलन को लेकर बहुगुणा सरकार के खिलाफ अपने गुरु पंडित सूर्य बली पांडे एडवोकेट स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ सैकड़ो लोगों सहित जिला जेल में गिरफ्तार होकर जिला कारागार में गए। उस समय एसडीएम सदर हसनैन रजा थे उनसे आपकी बहुत बड़ी झड़प हुई थी। मास्टर रमाशंकर सिंह राजपति मिश्र बाबा और मैं अरुण पांडे अशोक पांडे प्रेम शंकर दुबे चंद्रभान सिंह डॉ दिनेश सिंह सिंह आदि अनेक लोग जेल गए थे।
आपातकाल लगा आपातकाल लगते ही सारे अधिकारी जो आपसे बहुत परेशान थे। आपको मीसा में गिरफ्तार करके प्रतापगढ़ जेल में भेजा गया जहां पर पंडित रामसेवक तिवारी एडवोकेट पंडित सूर्य बली पांडेय एडवोकेट स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जवाहरलाल श्रीवास्तव माधव सिंह राणा कृष्णकांत ओझा संगम लाल शुक्ला अशोक पांडे राजाराम शुक्ल किसान कुंवर तेजभान सिंह विद्या शंकर पांडे अनिल पांडे सहित अनेक लोग मीसा में जेल में बंद थे। कई लोग डी आई आर में थे जिसमें से मुख्य रूप से बाबूलाल श्रीवास्तव पूर्व विधायक लखनलाल लोहिया विजयपाल सिंह डॉक्टर प्रेमचंद दुबे अंबिका सिंह लल्ला राम मूर्ति त्रिपाठी कर्नल सरदार सिंह आदि थे।
एक दिन आप अपने गुरु पंडित सूर्यबली पांडे एडवोकेट के साथ बैठकर कुछ वार्तालाप कर रहे थे। इसी समय शीशे में दाढ़ी बनाते समय पीछे से आते हुए जेलर श्रीवास्तव को देखा उसे बहुत गाली दिया जेलर जाकर के सुपरिंटेंडेंट को बताया और उसी दिन आपके और पंडित सूर्यबलीपांडे पांडे दोनों के खिलाफ जिलाधिकारी का आदेश पारित हुआ। आपको बरेली जेल और पंडित सूर्यबली पांडे को अलीगढ़ जेल भेजा गया। बरेली जेल में जय गुरुदेव बंद थे उन्हें बीड़ी डाली गई थी एक दिन जय गुरुदेव को बुलाकर बहुत डांटे कि तुम मसलिन की धोती और गमछा पहनते हो और चेलों को बोरा पहनते हो जय गुरुदेव बहुत डर गये वहां से आपका ट्रांसफर बनारस जेल कर दिया गया। बनारस जेल में जेलर के खिलाफ एक चिट्ठी लिखा कि यह जेवर बहुत बेईमान है रोटी तक जो है बेचता है और नीचे निवेदक में अपने मित्र विद्या शंकर पांडे का नाम लिख दिया। डीएम ने जांच किया जेलर जाकर विद्या शंकर पांडे से रोने लगा कहा कि आप हमसे क्यों नाराज है पांडे जी बड़े ही सज्जन व्यक्ति थे उन्होंने कहा कि क्या बात है। जेलर ने कहा कि आपने मेरे खिलाफ पत्र लिखा है बाद में पता चला कि वह पत्र तो कृपा शंकर ओझा ने लिखा था।
यह वह दौर था जो आपके परिवार पर एक कठिन परिस्थितियों को लेकर के आया था मित्र यार छोड़िए रिश्तेदार भी बात नहीं करते थे, किंतु आपकी धर्मपत्नी श्रीमती देवहूती ओझा अपने बच्चों गिरीश चंद्र ओझा जगदीश ओझा मुक्त कुमार ओझा मुक्कू दीपक ओझा तथा पुत्री मंजू मधु व कामिनी को लेकर संघर्ष करती रही कभी भी किसी के सामने परिवार नतमस्तक नहीं हुआ। 19 माह तक आपातकाल में अपना जीवन जेलों में बिताया। 1977 में पंडित विद्या शंकर पांडे को विधायक बनाने में आपका विशेष योगदान रहा। आप हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में आजीवन अपना योगदान प्रदान किया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी आपका बहुत सम्मान करते थे।
वकील परिषद प्रतापगढ़ के अध्यक्ष पद को आपने सुशोभित किया। वकील परिषद में आप भानु प्रताप त्रिपाठी मराल जी को सदैव मजाक में बहुत कुछ कह देते थे लेकिन मराल जी कभी बुरा नहीं मानते थे। बाबू रामपाल सिंह एडवोकेट आपके परम सहायक साथी थे। बेल्हा चंद्र समाचार पत्र के आप आजीवन संरक्षक रहे। किसी अधिकारी किसी व्यक्ति के सामने कभी झुके नहीं लेखक के पिता पंडित सूर्य बली पांडे को अपना गुरु मानते थे। उनके अतिरिक्त आप कभी किसी का पैर नहीं छूते थे। आप कहते थे सब का गुरु मैं हूं और मेरे गुरु पांडे जी हैं। यदि किसी भी व्यक्ति को किसी जज के खिलाफ भनक लग जाती की मेरा मुकदमा गड़बड़ कर देगा तो आप जिला जज के सामने उस वादकारी की पैरवी करके मुकदमे को ट्रांसफर करवा देते थे। आप कहते थे भारत का संविधान नकलची संविधान है, क्योंकि यह कई देशों के संविधान को मिलाकर बनाया गया है। हिंदी के लिए कहते थे इस देश का दुर्भाग्य है कि आज भारत की सर्वोच्च अदालत में अपनी बात आप हिंदी में नहीं कर सकते हैं। यदि आपको अपनी बात कहना है तो अंग्रेजी में कहना पड़ेगा इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाना चाहिए।
हम ऐसी महान व्यक्तित्व के धनी लोकतंत्र रक्षक सेनानी को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन करते हैं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आपका दास के ऊपर बहुत ही स्नेह था कहते थे ओमप्रकाश मेरा भी धीमताम शिष्य है। मैं जब भी याद करता मेरे कार्यकमो में आप पधारते और उस कार्यक्रम के आप अध्यक्ष होते थे। आप कहते थे मेरा चेला बहुत बदमाश है। मुझे अध्यक्ष बनाता है क्योंकि जिससे मुझको अंतिम में कम बोलना पड़े। ऐसे कर्मवीर को शत-शत नमन विनम्र श्रद्धांजलि।
धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास

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